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E-BOOK KAISE LIKHEN AUR PUBLISH KAREN- ईबुक कैसे लिखें और पब्लिश करें (PART 1)

किताब लिख कर पैसे कैसे कमायें/ KITAB LIKH KAR PAISE KAISE KAMAYEN 

वैसे लिख के पैसे कमाने के तो कई तरीके हैं मगर यह एक्सपर्ट लोगों का काम है और उनके लिये कई प्लेटफार्म हो सकते हैं लेकिन एक आम यूजर के लिये क्या इस फील्ड में कोई विकल्प है? बिलकुल है.. अगर आप इस तरह के लेख लिखते हैं जो किसी स्पेसिफिक क्षेत्र को टार्गेट करते हैं, मसलन एज ए डाॅक्टर स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ लिखते हैं, टीचर हैं और शिक्षा पर ऐसा कुछ लिखते हैं जो छात्रों के काम आ सके, कोई टेक्निकल टैलेंट रखते हैं और तकनीक से सम्बंधित किसी क्षेत्र विशेष के लिये कुछ लिखते हैं, या कोई आर्थिक विशेषज्ञ हैं और बिजनेस सम्बंधित लेख लिखते हैं.. या शायर हैं शायरी लिखते हैं, कवि हैं कवितायें लिखते हैं, व्यंग्यकार हैं व्यंग्य लिखते हैं तो उसे एक किताब का रूप दे कर पब्लिश कर सकते हैं जिससे न सिर्फ आपकी विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में दिलचस्पी रखने वाले लोग उस चीज का फायदा उठा सकते हैं बल्कि साथ ही आप पैसे भी कमा सकते हैं।

अब किताब छपवाना बड़ा महंगा प्रोसेस है और छप भी गयी तो बिकना आसान नहीं, यहाँ तक कि वह लागत भी निकालनी मुश्किल होगी जो इस पर व्यय होगी। कोई भी पब्लिकेशन बिना पैसे लिये किताब नहीं छापेगा तो इस सिलसिले में बेहतर ऑप्शन यह है कि बिना कोई पैसे खर्च किये किताब को ईबुक का रूप दें और उसे पब्लिश करें। इस पूरे प्रोसेस में एक तरह से तीन चरण आयेंगे… पहला किताब को प्रोफेशनली डिजाईन करें, कवर डिजाइन करें। दूसरा किताब को तीन-चार प्लेटफार्म्स पर अपलोड करें.. जो अमेजाॅनकिंडलस्मैशवर्डगूगल प्ले बुक और इंस्टामोजो के रूप में मिलेंगे। तीसरा पब्लिश होने के बाद किताब को प्रमोट करें जिसके कई तरीके हो सकते हैं।

इस लेख में सभी तरह के प्रोसेस की आपको पूरी जानकारी मिलेगी।

स्मैशवर्ड के साथ एक फायदा यह है कि यहां अपलोड की हुई किताब स्मैशवर्ड के पार्टनर्स एपल, कोबो, बार्नेस एंड नोबल और सोनी जैसे वर्ल्ड लेवल प्लेटफॉर्म्स पर भी ऑटो अपलोड हो जाती है। इसके सिवा गूगल प्ले पर भी अपलोड कर सकते हैं।

ईबुक कैसे डिजाइन करें/E-BOOK KAISE DESIGN KAREN

साधारण भाषा में ईबुक किसी टेक्स्ट फाईल के पीडीएफ फार्मेट को ही कहते हैं और जब आप उसे पीडीएफ में कनवर्ट करते हैं तो वह सामान्यतः अपने आप उस रूप में ढल जाती है जिस रूप में आप उसे वर्ड फाईल के रूप में सेव करते हैं लेकिन इसमें कई चीजें ऐसी हैं जिन पर आपको विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। साधारण वर्ड फाईल अलग-अलग सिस्टम्स पर अलग ढंग से खुल सकती है जबकि पीडीएफ सभी सिस्टम पर समान रहती है।

यहां एक बात यह समझ लीजिये कि आपको वर्ड की फाईल ही प्रोफेशनली डिजाईन करनी पड़ेगी, क्योंकि जिन तीन-चार प्लेटफार्म्स पर आपको अपनी ईबुक अपलोड करनी हैं उनमें सिर्फ इंस्टामोजो और गूगल प्ले पर ही आपकी पीडीएफ फाईल अपलोड हो पायेगी जबकि किंडल पर सीधे वर्ड की फाईल अपलोड करनी पड़ती है जो किंडल खुद कनवर्ट करता है और अगर उसका प्रारूप सही न हुआ तो अपलोड होने के बाद वह रीडर्स को कुछ की कुछ दिखेगी।

और इन तीनों से अलग स्मैशवर्ड पर फाईल के यह दोनों ही वर्शन या अपलोड नहीं होंगे या वर्ड फाईल के रूप में हुई भी तो वह प्रीमियम कैटेलाॅग (जिसमें एपल, सोनी, कोबो जैसे पार्टनर प्लेटफार्म्स इनक्लूड हैं) में जगह नहीं पायेगी। यहां आपको कैलिब्रे पर डिजाईन की हुई ईपब फाईल अपलोड करनी होगी ताकि वह सभी प्लेटफार्म्स पर एक जैसी पढ़ी जा सके। तो चलिये बात करते हैं सबसे पहले किसी टेक्स्ट फाईल को ईबुक के रूप में ढालने की।

ईबुक का फार्मेट क्या होना चाहिये/ E-BOOK KA FORMAT KYA HONA CHAHIYE 

यूं तो आप कोई भी पेज साईज रखें, पीडीएफ, ईपब या किंडल फार्मेट में कनवर्ट होने पर वह अपने आप स्क्रीन के हिसाब से ढल जाती है लेकिन बेहतर यह है कि खुद ही वह शेप साईज दे लें जो मोस्टली रीडर्स पढ़ते हैं यानि एक स्मार्टफोन की स्क्रीन के हिसाब से, जिससे आपको खुद अंदाजा रहे कि आपकी फाईल में कौन सी चीज कहाँ और कैसी दिखेगी।

उसके लिये सारे कंटेंट को जिस भी पेज साईज की फाईल में रखे हैं, फाईल के “लेआउट” के फंक्शन टैब में जा कर कस्टम्स मार्जिन पे क्लिक करें और यहाँ खुलने वाली पाॅप अप में मार्जिन टाॅप 1.27 cm, बाॅटम 0.51 cm, लेफ्ट और राईट मार्जिन भी 0.51cm कर लें, ओरियंटेशन पोर्ट्रेट ही रखें, “पेपर” साईज में विड्थ  8.89 cm, और हाईट 15.24 cm रखें, “लेआउट” में सेक्शन स्टार्ट> न्यू पेज, ऑड इवन या डिफ्रेंट फर्स्ट पेज पे टिक करने की जरूरत नहीं। हेडर फुटर दोनों मार्जिन 0.25 cm रखें और सबसे नीचे “अप्लाई टु होल डाक्युमेंट” कर के ओके कर दें।

अब आपकी फाईल एक स्मार्टफोन के हिसाब से ढल जायेगी जो आगे किसी भी सिस्टम पर जरूरत के मुताबिक टैबलेट या डेस्कटॉप/लैपटाॅप की स्क्रीन के हिसाब से भी फिट हो जायेगी। अब इस फाईल में एक ध्यान आपको यह देना होगा कि पैराग्राफ़ मार्कर ऑन कर लें, जिससे आपको गैरजरूरी स्पेसिंग, लाईन गैप या पेज ब्रेक और सेक्शन दिखते रहें।

पहले पेज पर किताब और लेखक का नाम, दूसरे पेज किताब से सम्बंधित थोड़ी बहुत इनफार्मेशन, तीसरे पर कोई डेडिकेशन है तो, चौथे से किताब के बारे में जो कहना हो, पांचवे में कंटेंट सम्मरी और छठे से आपकी किताब स्टार्ट होती है। यहां इस गिनती का मतलब सिर्फ पेज न समझिये बल्कि इन्हें आपको “लेआउट” में जा कर “ब्रेक” फंक्शन से “नेक्स्ट पेज” के द्वारा सेक्शन ब्रेक करना होगा। यह ईबुक के लिये सबसे जरूरी चीज है वर्ना आपका किसी भी पेज का कंटेंट किसी भी पेज में घुसा रहेगा।

हर नया पेज जो आप सेपरेट पेज के तौर पर देखना चाहते हैं, उसे न आपको इंटर बटन से बनाना है, न कंट्रोल+इंटर के जरिये पेज ब्रेक से, बल्कि “नेक्स्ट पेज” के जरिये सेक्शन ब्रेक करके ही बनाना है। इसके सिवा भी कुछ चीजें आपको ध्यान में रखनी हैं, कि कोई भी हेडिंग जो आपको सेंटर में रखनी है वह “होम” के पैराग्राफ़ सेक्शन से रखनी हैं न कि स्पेस से खिसका कर। कंटेंट को जस्टिसफिकेशन भी यहीं से देनी है और सारे मैटर को सलेक्ट करके स्पेसिंग टैब में लाईन स्पेसिंग पर जा कर हिंदी मैटर है तो “एटलीस्ट 15 pt, और अंग्रेजी है तो 13 pt कर लीजिये। बाकी कंटेंट का फोंट साईज हिंदी में 9 और अंग्रेजी में 10 रख सकते हैं।

यहाँ दो प्वाईंट काबिले गौर हैं… पहला यह कि पेपरबैक वर्शन की तरह लिमिटेशंस नहीं हैं, आप फाईल में टेक्स्ट के साथ ढेरों कलर्ड/ब्लैक एंड वाईट तस्वीरें और वीडियो भी अटैच कर सकते हैं जिससे पूरी बुक आकर्षक बन सके और दूसरी चीज यह कि ईबुक में दो चीजें और भी एड करनी होती हैं, जो स्मैशवर्ड के सिवा बाकी प्लेटफार्म्स पर भले वैकल्पिक हों मगर ईपब फाईल में कंपलसरी होती हैं। पहली लेखक परिचय और दूसरी लेखक द्वारा लिखी गयी अन्य पुस्तकें या मटेरियल।

ईबुक फार्मेटिंग में सबसे अहम कड़ी होती है बुकमार्क्ड सम्मरी, क्योंकि यह कोई फिजिकल किताब तो है नहीं कि आपने एक सौ बीस पन्नों की किताब में बयासी पन्ने पढ़े थे तो वह पन्ना मोड़ कर रख दिया और जब दुबारा पढ़ना शुरू किया तो वहीं से शुरू कर दिया। ईबुक में आपको यह खास ख्याल रखना होगा कि आपका कंटेंट छोटे-छोटे सेक्शन में बंटा रहे और हर सेक्शन की एक हेडिंग हो जिसे आप बुकमार्क करके बाद में लिंक कर सकें, जिससे रीडर सम्मरी से उस स्पेसिफिक हेंडिंग पर टच कर सके डायरेक्ट इच्छित सेक्शन या पेज में पहुंच सके।

फाईल में हर सेक्शन को बुकमार्क और लिंक कैसे करें/ FILE ME HAR SECTION KO BOOKMARK AUR LINK KAISE KAREN

इसके लिये आप को पहले सेक्शन से शुरुआत करते हुए हर सेक्शन की हेडिंग को सलेक्ट करना है, “इंसर्ट” फंक्शन टैब पर क्लिक कर के “बुकमार्क” के ऑप्शन पे जाना है और वहां उसी हेडिंग के शुरुआती अक्षर या हेडिंग ही बिना स्पेस दिये लिखनी है और एड कर देना है।

अब सम्मरी में यही हेडिंग्स जो आपने लिखी होंगी (यहाँ पेपरबैक की तरह उनके आगे पृष्ठ संख्या नहीं लिखनी होती), उनपे एक-एक करके उन्हें सलेक्ट करके “इन्सर्ट” के ही “लिंक” ऑप्शन पे जायेंगे और लिंक टु: प्लेस इन दिस डाक्युमेंट्स के ऑप्शन में बुकमार्क की गयी उसी हेडिंग को सलेक्ट कर के “ओके” कर देना है। इस तरह पूरी सम्मरी लिंक्ड हो जायेगी, जिससे रीडर इच्छित हेडिंग पर टच कर के मनचाही जगह सीधे पहुंच सकेगा।

अब आइये ईबुक के फिनिशिंग टच पर जो है आपका कवर पेज। पेपरबैक का कवर मुश्किल चीज है, जिसमें कई चीजें रखनी होती हैं जो विशेषज्ञ ही कर सकता है लेकिन ईबुक का सिर्फ फ्रंट कवर ही होता है जो एक आम यूजर भी अपने सब्जेक्ट के हिसाब से फोटोशाॅप, कोरल पर बना सकता है या  कैनवाक्रियेटस्पेसनोशन या पोथी जैसे किसी भी सेल्फ पब्लिशिंग प्लेटफार्म्स के टूल की मदद से क्रियेट कर सकता है या खुद करना मुश्किल हो तो फाईबर पे किसी फ्रीलांसर से पांच डाॅलर में बनवा सकता है।

तो अब आपकी ईबुक पब्लिश होने के लिये तैयार है। अब इसे सिंपल वर्ड फाइल के रूप में भी सेव कर लीजिये और एक कॉपी सेव एज पीडीऍफ़ भी सेव कर लीजिये, जो इन्स्टामोजो और गूगल प्ले में काम आनी है।

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इन्स्टामोजो पे ईबुक कैसे पब्लिश करें/ INSTAMOJO PE E-BOOK KAISE PUBLISH KAREN

तो सबसे पहले गूगल प्ले पे जाइये और साईन अप के प्रोसेस को कंपलीट करके छोड़ दीजिये। उसपे अप्रूवल मिलने में टाईम लगेगा। इसके बाद दिये गये चित्रों के अनुसार इंस्टामोजो पर साईन अप करें। यहां एक चीज ध्यान रखें कि आपको हर जगह इंडीविजुअल की कैटेगरी में अकाउंट बनाना है और अपनी सही-सही डिटेल, बैंक अकाउंट और पैन कार्ड सहित देनी है। इंस्टामोजो पर महीने में दस हजार से ऊपर की लिमिट से पार जाना है तो ही केवाईसी सबमिट करने की ज़रुरत है वर्ना नहीं।

यहाँ आप चाहें तो प्रोफाईल डीपी और कवर फोटो लगा कर अपनी प्रोफाईल को एक प्रोफेशनल लुक दे सकते हैं और न चाहें तो कोई खास जरूरत नहीं। यहां से आप एड प्रोडक्ट पे जायें.. प्रोडक्ट टाईप में डिजिटल चुनें, उसके बाद अपनी पीडीएफ फाईल अपलोड करें, टाईटल, सब टाईटल भरें। एचएसएन कोड भरें, न पता हो तो छोड़ दें। प्राईज भरें, नीचे प्रोडक्ट डिस्क्रिप्शन में विस्तार से अपनी बुक के बारे में लिखें। नीचे कैटेगरी के ऑप्शन से चूज करें कि आपकी किताब किस विषय से सम्बंधित है और उसके नीचे टैग में वे शब्द भर दें जो आपकी किताब के साथ मैच करते हों।

नीचे फिलहाल आपके प्रोडक्ट के हिसाब से एडवांस सेटिंग में कुछ करने की जरूरत नहीं, मगर उसके नीचे एसईओ ऑप्शन में जरूर गूगल सर्च को ध्यान में रखते हुए टाईटल, शार्ट डिस्क्रिप्शन और कीवर्ड्स भरें। ऑप्टीमाइजेशन के लिहाज से कीवर्ड्स बहुत काम की चीज हैं जो आपकी किताब को गूगल सर्च में रैंक करा सकते हैं। तत्पश्चात “एड प्रोडक्ट टु स्टोर” पर क्लिक कर दें.. अब आपकी किताब इंस्टामोजो पर पब्लिश हो चुकी है।

गूगल प्ले बुक पर ईबुक कैसे पब्लिश करें/ GOOGLE PLAY BOOK PAR E-BOOK KAISE PUBLISH KAREN

इसके बाद अपनी मेल से यह कनफर्म कर चुकने के बाद कि आपको अप्रूवल मिल चुका है, गूगल प्ले पर आइये, यहाँ गेट स्टार्टेड पर क्लिक करके साईन अप का प्रोसेस पूरा करें। पब्लिशर टाईप में “सेल्फ पब्लिश राईटर” रखें, पब्लिशर नेम में चाहें तो कोई नाम रख लें या अपना ही दे दें, कंट्री इंडिया, नीचे इंडिया का कोड करके अपना नम्बर भरें और ओके कर दें, अगले पेज पे टर्म्स एंड कंडीशन को एग्री करते हुए आगे बढ़ेंगे तो यहाँ से सीधे होम पेज पर लैंड करेंगे।

यहाँ लेफ्ट साईड में दिये ऑप्शन से आपको बुक कैटेलाॅग पे क्लिक करना है, अगले पेज से “एड बुक” के ऑप्शन पे जाना है। अगले पेज पर सेल ऑप्शन में “सेल बुक ऑन गूगल प्ले” और बुक आईडी में “गेट ए गूगल बुक आईडी” को सलेक्ट करके, सेव कंटीन्यू करके आगे बढ़ जाना है।

अगले सेक्शन में किताब का टाईटल और डिस्क्रिप्शन भरना है। भाषा हिंदी कर दीजिये, पब्लिशर में जो नाम चाहें रख दें, पब्लिकेशन डेट रीसेंट डाल दे, पेज की संख्या भरें, फारमेट ईबुक भरें, सीरीज नेम और नम्बर भरने की जरूरत नहीं, मिनिमम एज 15, मैक्जिमम 18 कर दें, ऑडियेंसेज पर “नो” ही रखें, रिलेटेड बुक को छेड़ने की जरूरत नहीं और सेव एंड कांटीन्यू कर दें।

अगले सेक्शन में कैटेगरी भरनी है जहाँ इच्छित कैटेगरी लिख कर सर्च कर लें, जाॅनर में BISAC ही रहने दें और सेव करते आगे बढ़ जायें। अगले पेज पे अगर कोई कंट्रीब्यूटर है तो उसकी डिटेल दे दें या फिर सेव कर के आगे बढ़ जायें। सेटिंग में डीआरएम “यस” अप्लाई करें, प्रीव्यू 20% रहने दें, काॅपी पेस्ट लिमिट 0 कर के सेव कर दें।

इसके बाद फाईल अपलोड का पेज खुलेगा जहाँ आप अपलोड करते ही नयी पाॅप अप पायेंगे, जिसमें ब्राउज से कवर और पीडीएफ दोनों फाईल अपलोड कर दें। इसके बाद बुक प्राईस का पेज खुलेगा। यहां आपको यह ध्यान देना पड़ेगा कि अगर आप चाहते हैं कि यह बुक सिर्फ भारत में खरीदी जाये तो कंट्री इंडिया सलेक्ट कर के एक प्राईस भर दें या चाहें तो वर्ल्डवाईड रहने दें और वह प्राइस भरें जो ग्लोबली लागू हो, यह थोड़ा मुश्किल स्टेप है क्योंकि सभी देशों में किताबें अलग दाम में बिकती हैं जिनमें काफी फर्क होता है। बहरहाल इसे सेव करेंगे तो थोड़ा वक्त ले कर यह बुक गूगल बुक या प्ले स्टोर पर पब्लिश हो जायेगी।

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Written by Ashfaq Ahmad

गॉड्स एग्जिस्टेंस

अगर ईश्वर है तो विज्ञान के नज़रिये से कैसा हो सकता है

  इस सृष्टि को चलाने वाले किसी ईश्वर के होने न होने पर हमने काफी चर्चा की है— चलिये धार्मिकों के नज़रिये से इस संभावना पर भी विचार करते हैं कि वह वाकई है, और अगर है तो कहां हो सकता है और कैसा हो सकता है।

  इसे समझने के लिये थोड़ा डीप में जाना पड़ेगा— आप सीधे किसी आस्तिक वाले कांसेप्ट को पकड़ कर ईश्वर को नहीं समझ सकते। वे तो हर सवाल का दरवाजा बस ‘मान लो’ पर बंद किये बैठे हैं— अपनी बात को प्रमाणित करने के लिये उनके पास कोई तर्क नहीं होता। यह सही है कि कोई ईश्वर है या नहीं, यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता लेकिन अगर विज्ञान की तरह कोई थ्योरी ऐसी सामने रखी जाये जो थोड़ी व्यवहारिक हो तो एक संभावना तो बनती ही है।

  आस्तिक और नास्तिक के बीच ईश्वर के अस्तित्व के बाद दूसरा जो विवाद है वह बिग बैंग थ्योरी है। किसी आस्तिक के हिसाब से यह ब्रह्मांड खुदा की इच्छा पर वजूद में आया है और ‘कुन फयाकुन’ के  अंदाज में आया है जबकि विज्ञान के हिसाब से ब्रह्मांड का निर्माण बिग बैंग के जरिये हुआ है।

Books by Ashfaq ahmad

बिगबैंग क्या सचमुच हुआ था   

यानि करीब चौदह अरब वर्ष पहले सबकुछ एक बिंदू के रूप में बंद था जिसमें विस्फोट हुआ और स्पेस, टाईम और मैटर के रूप में यह यूनिवर्स अस्तित्व में आया। अब जिस वक्त की यह घटना है, उस वक्त तो न कोई इंसान मौजूद था और न उस वक्त का कोई रिकार्ड उपलब्ध है— फिर यह चुटकुले जैसा सच आखिर किस आधार पर एक थ्योरी मान लिया जाता है?

  इस थयोरी के कई प्वाइंट्स ऐसे हैं जो बस कल्पना भर हैं लेकिन कई प्वाइंट्स ऐसे हैं जो प्रैक्टिकल में सच साबित हुए हैं— जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्वांट यह है कि एक समय यह ब्रह्मांड बेहद छोटा और गर्म था जो बाद में धीरे-धीरे फैलता गया। इसे साबित करने के लिये एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेशन, कंप्यूटर सिमूलेशन और लार्ज हेड्रान कोलाइडर एक्सपेरिमेंट का सहारा लिया गया है। इसके सिवा कास्मिक माइक्रोवैव बैकग्राउंड के रूप में इसके सबूत पूरे ब्रह्मांड में जगह-जगह मौजूद हैं।

  निर्माण के शुरुआती तीन लाख साल तक यह इतना गर्म था कि इलेक्ट्रान्स और प्रोटान्स मिल कर एक एटम तक नहीं बना पा रहे थे। उस समय यह सारा मैटर हाईली आयोनाइज्ड प्लाज्मा के रूप में मौजूद था। इस प्लाज्मा से यूँ तो लाईट उस वक्त भी निकल रही थी लेकिन न्यूट्रल एटम की मौजूदगी के कारण फ्री इलेक्ट्रान लाईट को रीडायरेक्ट कर दे रहे थे— जिसके कारण वह ज्यादा दूर तक यात्रा नहीं कर सकती थी। धीरे-धीरे ब्रह्मांड फैलता गया और इसका तापमान और घनत्व घटता गया। फिर वह समय भी आया जब एटम अस्तित्व में आया। चूँकि न्यूट्रल एटम बनाने के बाद लाईट को रीडायरेक्ट करने के लिये कोई फ्री इलेक्ट्रान्स नहीं बचे थे तो पहली बार यह ब्रह्मांड ट्रांसपैरेंट बना।

  एटम बनने से पहले तक जो लाईट गर्म प्लाज्मा से निकलने के कारण ब्रह्मांड के हर कोने में एक साथ इन्फ्रारेड रेडियेशन के रूप में मौजूद थी— अब वह इस ब्रह्मांड में हमेशा ट्रेवल करने के लिये स्वतंत्र हो गयी। यह लाईट एक प्रमाण के तौर पर आज भी ब्रह्मांड में हर जगह मौजूद है। पिछले साढ़े तेरह अरब साल में ब्रह्मांड के फैलने के कारण इस लाईट का वैवलेंथ भी फैलता रहा जिसके कारण अब यह इन्फ्रारेड रेडियेशन तो नहीं रहा— पर इलेक्ट्रो मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम के माइक्रोवेव रीजन में इसे आज भी ब्रह्मांड में हर जगह डिटेक्ट किया जा सकता है जिसे हम कास्मिक माइक्रोवैव बैकग्राउंड के रूप में जानते हैं।

  जब कोई चीज काफी गर्म हो जाये तो उससे लाईट निकलनी शुरू हो जाती है— जैसे कोयला या तपते लोहे को ही ले लीजिये। गर्म वस्तु से निकलने वाली लाईट एक स्पेसिफिक पैटर्न फॉलो करती है, जिसे ब्लैक बॉडी रेडियेशन कहते हैं। अगर यह ब्रह्मांड शुरुआती दिनों में काफी गर्म था तो इससे भी तपते लोहे की तरह काफी लाईट निकली होगी। बीतते समय के साथ ब्रह्मांड ठंडा जरूर हुआ पर फिर भी हमें ब्लैक बॉडी स्पेक्ट्रम मिलने चाहिये और बिग बैंग थ्योरी के मुताबिक यह वाकई हर जगह पाया भी गया है।

Book by Ashfaq Ahmad

थ्योरेटिकल ब्लैक बॉडी कर्व से मिलान

  इसे जांचने के लिये एक थ्योरेटिकल ब्लैक बॉडी कर्व बनाया गया था जो बिग बैंग थ्योरी पर आधारित था, फिर कास्मिक माइक्रोवैव बैकग्राउंड से मिले डेटा से बनाये गये थर्मल स्पेक्ट्रम से इसका मिलान किया गया तो दोनों ग्राफ लगभग समान साबित हुए और इस ग्राफ से जब ब्रह्मांड  का तापमान निकाला गया तो वह 2.73 कैल्विन आया और जब वाकई में आज के ब्रह्मांड के तापमान की जांच की गयी तो 2.725 कैल्विन आया जो कि लगभग प्रिडिक्टेड तापमान के आसपास ही था— यहां भी बिग बैंग थ्योरी सही साबित होती है।

  ब्रह्मांड में कुछ भी देखने का जरिया वे फोटॉन्स हैं जो ट्रैवल कर रहे हैं और असल में हम उनके जरिये अतीत को देखते हैं। यानि अगर हम एक हजार प्रकाशवर्ष दूर के किसी तारे को देख रहे हैं तो वह इमेज दरअसल एक हजार साल पुरानी है जो प्रकाश के माध्यम से हम तक पहुंची है— इसी तर्ज पर ब्रह्मांड में हम ब्रह्मांड के अतीत को देख सकते हैं। 

  शुरुआती गर्म दौर के बाद जब ब्रह्मांड ठंडा होना शुरू हुआ और हाइड्रोजन एटम्स बनने  शुरु हुए, गर्म प्लाज्मा गैस में तब्दील हुआ तो उस समय में केवल गैस के बादल ही मौजूद थे। बिग बैंग थ्योरी के अनुसार अगर हम ब्रह्मांड के अतीत में देखते हैं तो हमें यह गैस क्लाउड्स दिखने चाहिये और मज़े की बात यह कि आधुनिक टेलिस्कोप की मदद से जब बारह से तेरह अरब साल पहले के ब्रह्मांड को देखा गया तो गैस क्लाउड्स वाकई मिले भी।

डोप्लर शिफ्ट इफेक्ट का एक्सपेरिमेंट

इसके सिवा डोप्लर शिफ्ट इफेक्ट के निष्कर्षों से बिग बैंग थ्योरी के अकार्डिंग यह भी साबित हो गया कि एक समय यह ब्रह्मांड छोटा था, जो बाद में एक्सपैंड हुआ और लगातार आज भी एक्सपैंड हो रहा है।

  इसे यूँ समझ सकते हैं कि एक शोर मचाती गाड़ी आपकी तरफ आती है और गुजरती हुई दूर चली जाती है। उसकी आवाज हल्की से तेज होती फिर हल्की होती जाती है। ऐसा साउंडवेव के वेवलेंथ की वजह से होता है, कोई आवाज आपसे दूर जा रही है तो उसकी वेवलेंथ स्ट्रेच हो कर बढ़ती जाती है, और यही वेवलेंथ जितनी कम होती जायेगी, उतनी ही आवाज आपको तेज सुनाई देगी। 

ऐसा ही लाईट के साथ भी होता है क्योंकि वह भी एक वेव है— जो जब हमसे दूर जायेगी तब उसकी वेवलेंथ बढ़ने पर उसके किनारे लाल पड़ते दिखेंगे, जबकि स्थिर होने पर ऐसा नहीं होगा। इसी आधार पर दूर होती गैलेक्सीज हमें यह बताती हैं कि यूनीवर्स एक्सपैंड हो रहा है।

  कुल मिलाकर बिग बैंग थ्योरी भले सारे सवालों के जवाब न देती हो पर कई सवालों के जवाब तो जरूर देती है और इस संभावना को बल देती है कि इस यूनिवर्स का निर्माण बिग बैंग से हुआ है। अब यह बिग बैंग खुद से हुआ या यूनिवर्स का निर्माण करने के लिये किसी अलौकिक या वैज्ञानिक शक्ति ने किया— यह तय करने की हालत में कोई नहीं है, लेकिन हम चूँकि ईश्वर के होने की संभावना पर विचार कर रहे हैं तो मान लेते हैं कि यह बिग बैंग उसी ने किया।

Book by Ashfaq Ahmad

Written by Ashfaq Ahmad

प्रोग्राम्ड यूनिवर्स

दुनिया में इंसान क्यों है?

   एक बड़ा सवाल अक्सर खोजी प्रवृत्ति के लोगों को घेरे रहता है कि अब तक हुई वैज्ञानिक खोजें यह तो बता पाती हैं कि कोई चीज कैसे है— लेकिन ‘क्यों’ है, यह सवाल अभी भी अंधेरे में है। अगर आप सिर्फ अपने प्लेनेट को ही देखें तो आपको यहां लगभग सजीव, निर्जीव हर स्पीसीज अपने होने के किसी न कारण के साथ मौजूद नजर आयेगी— सिवा इंसान के।

शायद यही वजह है कि दुनिया में एक तबका ऐसा भी है जो इंसान को पृथ्वी का मूल निवासी ही नहीं मानता और इसे कहीं बाहर से ला कर रोपी गयी स्पिसीज मानता है।

  एक इंसान ही है जिसके होने का कोई औचित्य स्पष्ट नहीं होता— क्योंकि किसी भी जीव के विलुप्त होने से जहां कहीं न कहीं पृथ्वी के प्राकृतिक चक्र पर प्रभाव पड़ता नजर आता है— वहीं इंसान के लुप्त होने से प्रकृति पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ता तो नहीं दिखता, उल्टे पृथ्वी का बिगड़ता संतुलन वापस बेहतर स्थिति में आने की संभावनायें और प्रबल होती दिखती हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जाये तो इस प्लेनेट पर अकेला इंसान ही ऐसा जीव है जो अपनी हरकतों से इस ग्रह के नाजुक संतुलन को बिगाड़ कर इसे नष्ट करने में अभूतपूर्व योगदान दे रहा है। अगर इस ‘इंसान क्यों है’ का जवाब धार्मिकों के एंगल से देखा जाये तो वह यह कह कर खुद को बहला लेते हैं कि अल्लाह ने इंसान को अपनी इबादत के लिये बनाया है— लेकिन यह कोई हजम होने वाला तर्क नहीं।

इबादत के लिये उसके पास फरिश्तों की कौन सी कमी थी और यह भी अजीब लगेगा आपको सिर्फ सोच कर ही, कि अगर आप एक सक्षम वैज्ञानिक हैं तो ढेर से रोबोट्स आप सिर्फ इसलिये बना डालेंगे कि वे दिन रात आपकी चापलूसी, आपकी जयकार करें और इसी से आपको आत्मसंतुष्टि मिल जायेगी।

ईश्वर शब्द ही भ्रम है..

असल में ईश्वर शब्द ही एक भ्रम है— जब इंसान इतना आधुनिक नहीं हुआ था कि प्रकृति को समझ सकता, तब उसके लिये बादल, बिजली, आंधी, तूफान, ओलावृष्टि, बंवडर, आग, भूकम्प जैसी हर प्राकृतिक आपदा एक अबूझ पहेली थी और इससे निपटने का उसके पास सिवा इस अवधारणा के कोई भी दूसरा विकल्प नहीं था कि कोई शक्ति है जो इन सभी न समझ में आने वाली घटनाओं पर प्रभावी है और इस शक्ति की एक पहचान निर्धारित की गयी थी ‘ईश्वर’ या इसके ‘यहोवा’ जैसे पर्यायवाची शब्दों में।

  फिर हमने पीढ़ी दर पीढ़ी एक महान गलती को अंजाम देते हुए विकसित होते दिमागों की खोजी प्रवृत्ति को नष्ट किया— उनके बचपन में ही उन सहज सवालों का गला अपने तराशे हुए जवाबों से घोंट दिया जिनके सहारे वे बच्चे अपने दौर में उपलब्ध ज्ञान को आधार बना कर शायद अब तक हम वर्तमान मानवों को टाईप टू सिविलाइजेशन में कनवर्ट कर चुके होते, जबकि हमें अभी टाईप वन सिविलाइजेशन की देहरी तक पंहुचने में ही सौ साल से ज्यादा लगेंगे— जो यह बताता है कि एक सुप्रीम स्पिसीज के तौर पर हमारी प्रगति की गति कितनी धीमी है और उसकी मुख्य वजह है प्रकृति को ले कर गढ़े गये वे जवाब— जिनका आधार धर्म है और जिसकी वजह से मेधावी से मेधावी बच्चे के जहन को भी बंद कर देते हैं।

  हालाँकि वर्तमान में उपलब्ध ज्ञान के हिसाब से देखा जाये तो ‘ईश्वर’ से ज्यादा ‘यूनिवर्स मेकर’ या ‘सृष्टि रचियता’ जैसा शब्द ज्यादा फिट लगता है लेकिन सदियों से धर्म के मोह में फंसे भयाक्रांत दिमागों के लिये इस रिकॉग्नाइज्ड शब्द की जकड़न से निकल पाना कोई आसान चीज नहीं— हां अगर वे अपनी अगली पीढ़ियों की वैज्ञानिक शिक्षा पर जोर दें तो वे इस भ्रमजाल से निकल कर सही मायने में उस खोज की दिशा में अग्रसर हो सकती हैं, जहां वे इस यूनिवर्स मेकर या मेकर्स वाली थ्योरी को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकते हैं… अगर कोई वाकई सृष्टि रचियता है तो।

  इस लेख में हम उन कई संभावनाओं पर चर्चा करेंगे जिनसे यह शंकायें पैदा होती हैं कि असल में हम जिसे एक सहज रूप से चलती प्रकृति के रूप में देखते हैं, वह एक कंप्यूटराइज्ड प्रोग्राम भी हो सकता है और क्या इससे यह सब ‘होने’ की या इंसान के होने के औचित्य पर कुछ रोशनी पड़ सकती है… और अगर ऐसा है तो इस प्रोग्राम को डिजाइन करने वाला या वाले कौन हो सकते हैं, जिनके लिये सबसे उपयुक्त शब्द ‘यूनिवर्स मेकर’ ही है।

  जाहिर है कि न मैं अंतिम निर्णय पर पंहुच सकता हूँ, न अभी तक कोई वैज्ञानिक पंहुच पाया है और न आप पंहुच सकते हैं— इसलिये दावा कोई भी नहीं है। यह आप पे डिपेंड करता है कि आप इन संभावनाओं को किस तरह लेते हैं।

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आखिर क्यों एग्नोस्टिसिज्म ज़रूरी है..

 अगर हमें किसी चीज को समझना है तो हम तभी कामयाब हो सकते हैं जब हम सभी संभावनाओं के दरवाजे खुले रखें। अगर हम किसी एक भी दरवाजे को बंद कर देते हैं तो हमारा विश्लेषण शायद ही पूर्णतः तक पंहुच पाये और इस वजह से मेरा मानना है कि अगर नेचर, या कहें कि यूनिवर्स को समझना है तो एथीज्म से बेहतर रास्ता एग्नोस्टिसिज्म है क्योंकि नास्तिक के तौर पर आप एक संभावना (कि यह सब किसी क्रियेटर ने बनाया) को सिरे से खारिज कर देते हैं और आस्तिकता सबसे बदतर रास्ता है क्योंकि वहां आप एक संभावना के अतिरिक्त सारी संभावनाओं को खारिज कर देते हैं।

  जबकि हकीकत यह है कि यह यूनिवर्स, यह प्लेनेट्स, यह प्रकृति, यह जीव क्यों हैं— इसे लेकर हम जितनी भी संभावनाओं पर मनन कर सकते हैं, उनमें सबसे लचर और घटिया थ्योरी आस्तिकों वाली ही है और उसकी वजह भी है। आज हम जितनी भी थ्योरीज को सामने रख सकते हैं— वे हमारी हजारों खोजों के बाद अपने आसपास उपलब्ध ज्ञान पर निर्भर हैं जबकि आस्तिकवाद, सिविलाइजेशन के उस शुरुआती दौर से है— जिस वक्त इंसान ने ठीक से कपड़े पहन्ना, खाना खाना या घर बनाना तक नहीं सीखा था लेकिन प्रकृति के अबूझ रौद्र रूप से मुकाबला करने के लिये, अनसुलझे सवालों से जूझने के लिये, परिस्थितिजन्य या मानसिक कमजोरी से उबरने के लिये उसने एक अदद “ईश्वर” की रचना— और इंसानी जिंदगी को सुरक्षित और समाजिक व्यवस्था के संचालन के लिये एक धर्म की स्थापना जरूर कर ली थी।

  इस ईश्वर के इर्द गिर्द धारणाओं, कल्पनाओं और मान्यताओं का जो जाल अलग-अलग देश, काल, हालात में गढ़ा गया— उसे ही हम अलग-अलग धर्मों के रूप में जानते हैं, लेकिन चूँकि यह सारा गढ़न उस दौर में किया गया था जिस दौर में इस नेचर या यूनिवर्स से जुड़े किसी मामले की कोई जानकारी ही ठीक ठाक नहीं उपलब्ध थी तो ऐसे में जाहिर है कि उनमें कमियों की भरमार होनी तय थी और सभी धार्मिक कांसेप्ट में व्याप्त यह कमियां उन लोगों को, जो उस दौर में पैदा हुए जब नेचर को लेकर बहुत सारा ज्ञान हासिल किया जा चुका था— नास्तिकता के लिये प्रेरित करती हैं।

  क्योंकि उनके पास वर्तमान तक हासिल ज्ञान की बदौलत विकसित वह तर्कशक्ति है जिसकी बदौलत वे उस काल्पनिक ईश्वर और उस धार्मिक साहित्य की धज्जियां उड़ा सकते हैं जो असल ज्ञान के हिसाब से कहें तो अंधकारयुग में गढ़े गये थे लेकिन यहां पे उन्हें यह भी सोचना चाहिये कि उनकी नास्तिकता उस ईश्वर के अकार्डिंग है— जिसे अनपढ़ और ज्ञान से महरूम इंसानों ने खुद गढ़ा है, जबकि इसके बजाय एक संभावना इस बात की भी तो है कि वाकई कोई क्रियेटर (आस्तिक की मान्यता में ईश्वर) हो और वह किसी इंसान की सीमित समझ से सिरे से बाहर हो…

  लेकिन यहां वे इस मान्यता के साथ ठीक आस्तिकों की तरह ही जड़ हो जाते हैं कि नहीं— कोई नहीं है। जबकि उनके पास भी इस दावे को साबित करने के लिये कोई पुख्ता प्रमाण नहीं। इस बिंदु पर आ कर वे उल्टे आस्तिक हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने भी आस्तिकों की तरह ही यह मान्यता/आस्था बना ली है कि सबकुछ सेल्फमेड है, ऑटोमेटिक है और कोई भी इसका क्रियेटर नहीं हो सकता।

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Written by Ashfaq Ahmad

धर्मयात्रा

धर्मों की व्याख्या

चलते हैं आधुनिक दुनिया के जाने पहचाने धर्मों की व्याख्या पर… इनकी ज़रुरत कम्युनिकेशन के सहारे साझा मिथकों वाले बड़े समूहों को तैयार भर ही नहीं थी… और भी छोटे-छोटे कई कारण हो सकते हैं कि इनकी ज़रुरत महसूस की गयी हो। किसी महापुरुष ने कहा है कि अगर हमें किसी चीज को समझना है तो हमें पहले उसके उद्देश्य को समझना चाहिये क्योंकि वह मुख्य है— बाकी बात को कहने के लिये उपमाओं, अलंकारों, प्रतीकों और रूपकों का जो सहारा लिया जाता है, वह कभी मुख्य नहीं होता लेकिन अगर आप उन्हें ही सबकुछ मान लेंगे तो निश्चित ही उद्देश्य से भटक जायेंगे।

  यह नियम उन सभी धर्म और धार्मिक किताबों पर लागू होता है। पहले तो यह समझें कि धर्म क्या है— वास्तव में धर्म है आपके सत्कर्म। आपके वह अमल जो मानव की भलाई के लिये हों और जो किसी भी कसौटी पर इंसानियत के खिलाफ जा रहा है, तो वह अधर्म है, कुफ्र है।

  यह पूजा अर्चना, रोजे नमाज अलग-अलग मतों सम्प्रदायों की पूजा पद्धतियां हैं न कि धर्म। यदि आप दिन रात पूजा पाठ रोजे नमाज कर रहे हैं और बाकी दिनचर्या में एक भी ऐसा काम कर रहे हैं जो मानव हित से परे हो, या उससे आपका चारित्रिक दोष साबित होता हो तो आप धार्मिक नहीं हैं, बल्कि धार्मिक होने का ढोंग कर रहे हैं। दूसरों को भी भ्रम दे रहे हैं और खुद भी भ्रम में हैं— और इसका दुखदायी पहलू यह है कि आज के दौर में शायद ही इस कसौटी पर कोई खरा उतरे।

धार्मिक किताबें सिर्फ व्यवस्था संचालन के लिये थीं

  अब आइये धार्मिक किताबों पर, वे चाहे जिस धर्म से संबंधित हों— वे न सिर्फ सामाजिक व्यवस्था के संचालन को परिभाषित करती हैं अपितु श्रेष्ठ मानवीय आचार व्यवहार को भी तय करती हैं। यहां लिखे जाने के वक्त की और आज की परिस्थितियों के अनुसार भेद हो सकता है लेकिन वह अलग विषय है।

  मसलन कुरान का बदला लेने जैसे आदेश या मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था। कुरान के आदेश उस वक्त के हालात के हिसाब से थे, उसी तरह मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित लिखी गयी होगी लेकिन श्रेष्ठ कुल के लोगों ने जब उसे जन्म आधारित मान लिया तो अब उस व्यवस्था को डिफेंड करने का कोई मतलब ही नहीं जो एक बड़े नागरिक समूह को शोषण के दलदल में धकेल देती हो।

  सभी धर्मों के उत्थान काल में ढेरों कहानियाँ लिखी गयीं जिनमें ज्यादातर रूपक कथायें थीं जिनके पात्र और कथानक को ग्रहण करने के बजाय उनके सार को ग्रहण करना था लेकिन दुर्योग से हुआ वही कि लोगों ने सार न ग्रहण करके पात्र ग्रहण कर लिये, कहानियाँ ग्रहण कर लीं। इस काम में हिंदू समाज अग्रणी रहा— जिसके फलस्वरूप न सिर्फ ढेरों अजीबो गरीब भगवान अस्तित्व में आ गये… इंसान से ले कर पशु पक्षी तक के अवतार में— अपितु ढेरों चमत्कारों भरी कहानियाँ भी वजूद में आ गयीं।

  वह कहानियाँ जो तर्क की कसौटी पर कहीं से खरी नहीं उतरतीं, उल्टे नास्तिकों या उदार व्याख्या वाले बुद्धिजीवियों की हंसी का कारण बनती हैं। इसका एक साईड इफेक्ट यह भी हुआ कि चमत्कार के मोहपाश में बंधे बाकी धर्म भी अपने धर्म और महापुरुषों के साथ जबरन चमत्कार जोड़ने लगे।

  सबसे लास्ट में वजूद पाये और बाकियों के मुकाबले सबसे व्यवहारिक धर्म इस्लाम भी इसके संक्रमण से न बच सका और सबसे लेटेस्ट भगवान साईं बाबा की अंतड़ियां भी धो कर पेड़ पर सुखाई जाने लगीं— यह हमारी मानसिक कमजोरी है कि हम चमत्कार को ही नमस्कार करते हैं।

धर्म को विज्ञान की ज़रुरत है मगर विज्ञान को धर्म की नहीं

  तो मूल रूप से धर्म या धर्म पुस्तकों का मूल उद्देश्य कभी चमत्कार से लोगों को अभिभूत करने या वैज्ञानिक चुनौतियों को स्वीकार करना या वैज्ञानिक शोध पेश करना था ही नहीं। विज्ञान एक अलग चीज है। धर्म जहां मानव जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिये था वहीं विज्ञान को मानव जीवन को सरल, सहज और सुरक्षित करने वाली विधा के रूप में रख सकते हैं।

  लेकिन चूँकि विज्ञान ने धर्म से संबंधित अनुमान आधारित कई अवधारणाओं को ध्वस्त कर दिया तो धार्मिक लोगों ने इसे अपना सहज शत्रु समझ लिया और इसे धर्म के मुकाबले तुच्छ और हीन साबित करने के लिये उन किताबों से साईंस निकालने लगे, जिनका मकसद कभी साईंस था ही नहीं।

  अब यह कोशिश दिन रात धर्म की रक्षा में लगे लोगों को हास्यास्पद बना देती है— जिसके जिम्मेदारी यह खुद को बहुत जहीन समझने वाले गैर जिम्मेदार लोग हैं न कि धर्म या धर्म पुस्तकें।

  बहरहाल, इस लेख में उन चमत्कारों और दावों पर चर्चा करूँगा— सबसे पहले बात बात होगी धर्म और धार्मिक व्यवस्थाओं की जरूरत क्यों और कहां से पड़ी।

  धर्म की जरूरत क्यों पड़ी, इसके लिये हमें मानव इतिहास में जाना पड़ेगा। देखिये, किसी परिस्थिति को समझने के लिये हम ‘आज’ में खड़े रह कर तो उसे नहीं समझ सकते, बल्कि दिमागी तौर पर हमें वहीं चलना होगा। अब इसे पीछे लिखे गयी मानव विकास यात्रा से थोड़ा अलग हट के वर्तमान में मौजूद मत मान्यताओं के नज़रिये से परखने की कोशिश करते हैं।

  इंसान के अवतरण की तीन तरह की थ्योरी प्रचालन में हैं जिसमें सबसे फेमस तो दो लोगों  (एडम ईव) से शुरू होने वाली आस्थागत थ्योरी है, दूसरी तार्किक रूप से खरी इवॉल्यूशन वाली थ्योरी है और तीसरी एक्सट्रा टैरेस्ट्रियल में यकीन रखने वाले वैज्ञानिकों की थ्योरी है कि हम मूलतः इस ग्रह से नहीं हैं बल्कि हम एलियन और चिम्प्स की मिश्रित नस्ल हैं।

  यानि वे मानते हैं कि कुछ एलियन पृथ्वी पर आये, यहां के सबसे ज्यादा आईक्यू वाले जानवर के साथ अपने जींस मिक्स करके एक नयी नस्ल बनाई जो कि मानव थे। यह एलियन लगातार पृथ्वी पर तब आते रहे हैं और इन्होंने ही इंसान को आग, पहिये या खेती वगैरह का ज्ञान दिया। इनके पास उड़ने की तकनीक थी— लड़ने के लिये अत्याधुनिक हथियार थे और यही वह लोग थे जिन्हें जनश्रुतियों में देवता फरिश्ते आदि कहा गया।

  अटलांटिस नाम का समुद्र में गर्क शहर इन्हीं का बसाया हुआ था और इनसे संबंधित कई तरह के प्रूफ मूफान आर्काइव में सुरक्षित हैं जिनके लिये शेष दुनिया का मत है कि वे किवदंतियों से ज्यादा कुछ नहीं— इसलिये हम इस थ्योरी को खारिज कर देते हैं।

आदम हव्वा या फिर इवॉल्यूशन  

जो थ्योरी आदम के रूप में पहले मानव से ही सिविलाइजेशन को स्थापित करती है— उसमें कई त्रुटियां हैं। मतलब एग्जेक्ट डेटा भले अभी अंधेरे में हो, मगर फिर भी पहले मानव के चक्कर में हमें कई लाख साल पूर्व तक जाना पड़ेगा और अगर आपने ओल्ड टेस्टामेंट (जबूर तौरात आदि) पढ़ा है तो आपको पता होगा कि उन्हें खेती बाड़ी, शिकार, आग, घर निर्माण, सब पहले से पता था। फिर तो आदिमानवों और उनकी विकास यात्रा का कोई मतलब ही नहीं रहा।

  यानि फिर जो पुरातत्विक प्रमाण साबित करते हैं कि इंसान ने यह प्रगति हजारों साल में धीरे-धीरे की है, वह फिट ही नहीं बैठेंगी तो इस थ्योरी को भी हाथ उठा कर आस्थागत ‘जय हो जय हो’ रूपी गुणगान के लिये छोड़ कर डार्विन की थ्योरी के साथ ही चलना पड़ेगा।

  यानि चाहे श्रंखला किन्हीं दो लोगों से शुरू हुई हो (यहां अपनी संतुष्टि के लिये आप उन्हें आदम हव्वा मान लें) या चिम्प्स का कोई परिवार या समूह भोजन या सुरक्षा के मद्देनजर जंगल से निकला, उसने दो पैरों पे चलना शुरू किया और क्रमिक विकास के सहारे वर्तमान मानव तक पंहुचा… पर यह तय है कि उसने तब किसी सुप्रीम स्पीसीज से महरूम घने वनों वाले प्लेनेट पर किसी जंगल से ही यह सफर शुरू किया था।

  इस मान्यता के साथ आप आदम हव्वा को भले एडजस्ट कर लें लेकिन पहले ही आदमी से सिविलाइजेशन शुरू करने वाली बाईबिल की थ्योरी उस सूरत में भी आपको ठुकरानी ही पड़ेगी।

आग और पहिये ने सभ्यता को नयी दिशा दी

  बहरहाल— पहले यह लोग जंगली फल फूल पौधे वगैरह खाते रहे होंगे लेकिन बाद में पत्थरों से वह हथियार बनाये जिनसे जानवरों का शिकार कर सकें और कच्चा मांस आदि खाना शुरू किया। आगे चल कर उन्हें किसी तरह आग का ज्ञान हुआ और वे मांस पका कर खाने लगे… फिर कालांतर में उन्हें खेतीबाड़ी, पहिये के इस्तेमाल की जानकारियाँ हुईं, जिनसे उनका जीवन कुछ और सुगम हुआ।

  आगे चल के इनकी आबादियां बढ़ीं और इन्होंने प्रवास शुरू किया। दुनिया के अलग अलग वनक्षेत्रों में पंहुचे— जहां भोजन की प्रचुरता मिली, कृषि के लिये उपजाऊ भूमि मिली, वहीं बसते गये। तब स्थायी बस्तियां बसाने से पहले इंसानों के भी जानवरों की तरह ही भोजन और प्रजनन से इतर कोई ख़ास लक्ष्य नहीं थे— बड़े समूहों में ढलने से पहले उन्हें किसी तरह के धर्म की जरूरत ही नहीं थी लेकिन जब तादाद बढ़ती है तो समस्यायें अपने आप पैदा होने लगती हैं।

  वे कबीलों के रूप में बसे थे जिसके सबूत आज भी अफ्रीका और अमेजॉन में मिल जायेंगे— लेकिन आबादियां बढ़ने के साथ कबीलों का फैलाव कुछ नगरों के रूप में होने लगा। भोजन के ज्यादा मौकों, शक्ति, निर्माण कार्य और स्त्रियों के पीछे वे एक दूसरे पे हमले करने लगे। यहां तूती उसी की बोलती थी जिसके पास ताकत हो।

  लूट और हमलों के पीछे तब भले मजदूर, भोजन, धन, और स्त्रियाँ कारण हों— लेकिन बाद के सभ्य दौर तक इस तरह के हमलों की वजह धन और स्त्री ही बनी रही… और इस प्रचलन के कारण इंसानी जिंदगी (खासकर पुरुषों की) बेहद अस्थिर, अनिश्चित और असुरक्षित बनी रही। तब सर्वाईव करने के लिये उन्हें लगातार छुपना, बचना और लड़ना पड़ता था। इन परिस्थितियों को आप ‘अपोकैलिप्टस’, ‘10,000 बीसी’ जैसी हॉलीवुड फिल्मों में बखूबी समझ सकते हैं। 

Written by Ashfaq Ahmad

मानव विकास यात्रा

होमोसेपियंस अकेली प्रजाति क्यों है

 पिछले कई हजार सालों से हम अकेली अपनी प्रजाति को देखने के इतने आदी हो गये हैं कि हमारे लिये यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि पृथ्वी पर कभी मनुष्यों की और भी प्रजातियां रहा करती थीं लेकिन पूर्वी अफ्रीका से होमो सेपियंस नामी जिस प्रजाति का उभार हुआ— उसने अफ्रीका से निकल कर पूरे वैश्विक पटल पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया और बाकी प्रजातियों का वजूद ही मिट गया।

 तब से हम अकेली प्रजाति हैं और बड़े आराम से शुरुआती मानवों के रूप में मनु शतरूपाआदम हव्वा टाईप कल्पना को गढ़ लेते हैं और आंख बंद कर के उन पर यकीन कर लेते हैं— लेकिन सोचिये कि अगर वे विलुप्त हुई प्रजातियां भी सर्वाइव कर जातीं तो इन कहानियों का क्या होता।

 फिर इन आदिम जोड़ियों की पहचान क्या होती? किस हिसाब से मरने के बाद वाली कहानियाँ गढ़ी जातीं और पुनर्जन्म की अवधारणा फिर इन प्रजातीय सीमाओं में बंधी होती या आत्मा सेपियंस से निकल कर डेनिसोवा और उससे निकल कर नियेंडरथल्स की भी सैर कर रही होती और सभी प्रजातियां क्या एक जैसे ईश्वरीय कांसेप्ट पर यकीन कर रही होतीं?

सबसे लम्बी पारी खेलने वाले होमोइरेक्टस

बहरहाल अगर हम मानव विकास यात्रा को ठीक से समझें तो होमो इरेक्टस ने अतीत में सबसे लंबी पारी खेली है और इसका रिकार्ड तोड़ना हमारे यानि वर्तमान प्रजाति के बस की भी बात नहीं। होमो सेपियंस डेढ़ लाख साल पहले से सफर शुरु करते हैं और सत्तर हजार साल पहले वे अफ्रीका से निकल कर धीरे-धीरे विश्व भर में फैल जाते हैं।

और शुरुआती संघर्षों को छोड़ दें तो जब से कृषि क्रांति हुई और यह प्रजाति संगठित समाजों के रूप में परिपक्व होनी शुरू हुई तब से अब तक बहुत छोटे अरसे में ही हमने इतनी तरक्की कर ली है कि अगले बस एक हजार साल में ही हम दो तरह के परिणामों की संभावना पर सिमट कर रह गये हैं कि या तो हम अपने प्लेनेट को छोड़ कर अंतरिक्ष में विचरने वाली स्पिसीज बन के रह जायेंगे या यहीं लड़ भिड़ कर, अकाल, भयंकर रूप से असंतुलित होती पृथ्वी की प्रतिक्रियात्मक आपदाओं या किसी तरह के ग्लोबल संक्रमण का शिकार हो कर खत्म हो जायेंगे।

  और हमारी पृथ्वी पर कुल यात्रा दो लाख साल भी न रह पायेगी जबकि होमो इरेक्टस ने बीस लाख साल लंबी पारी खेली है। हम ठीक-ठीक नहीं जानते कि होमो सेपियंस के रूप में वर्गीकृत की जाने वाली प्रजाति कब, कहां और कैसे विकसित हुई लेकिन ज्यादातर वैज्ञानिकों की राय है कि पूर्वी अफ्रीका के कई हिस्सों में डेढ़ लाख साल पहले वे सेपियंस के रूप में पहचाने वाले वह लोग वजूद में आ चुके थे जो दिखने में लगभग हमारे ही जैसे थे।

  ऐसे में जहन में यह सवाल उठना लाजमी है कि अगर हम सेपियंस का उदभव वहां से ही मानें तो डेढ़ लाख साल में हम कहां से कहां पहुंच गये तो आखिर होमो इरेक्टस बीस लाख साल तक वजूद में रहने के बावजूद कैसे कोई भी तरक्की न कर पाये— और लाखों साल के सफर में वे अपनी शुरुआती अवस्था में ही कायम रहे और एक दिन लुप्त हो गये… आखिर क्या फर्क रहा उनके और हमारे बीच?

  इसका कोई क्लियर जवाब किसी के पास नहीं— बस सबकुछ अनुमानों पर ही आधारित है। हां अगर हम इसे समझना चाहें तो यूँ समझ सकते हैं कि मनुष्यों की सभी प्रजातियां किसी कपि से इवॉल्व (डार्विन की इवॉल्यूशन थ्योरी) हुई थीं लेकिन उनमें वे गुण हमेशा बने रहे और वे गुण आज भी सारे जीवों में (मनुष्यों को छोड़ कर) विद्यमान हैं कि उनका सारा जीवन तीन बिंदुओं के इर्द गिर्द ही चलता है— भोजन, खतरा और प्रजनन

होमोसेपियंस कैसे सर्वाइव किये

  भाषा मानव विकास यात्रा में बहुत बाद की चीज है— पर कम्यूनिकेशन के तय संकेत शुरुआती दौर से हैं और सभी जीवों में पाये जाते हैं। सभी बड़े जीवों के बीच कम्यूनिकेशन इन्हीं तीन बिंदुओं पर आधारित होता है। मनुष्यों की शुरुआती प्रजातियां भी इससे मुक्त नहीं थीं। थोड़े क्रूर शब्दों में कहा जाये तो वे जानवरों से इवाल्व हुए थे और जानवरों जैसा ही जीवन जीते थे।

  छोटे-छोटे समूह होते थे (बिना भाषा और परस्पर सहयोग के लिये साझा मिथकों के अभाव में बड़े समूह नहीं बन सकते) और कोई मुस्तकिल ठिकाना नहीं। भोजन की तलाश में मारे-मारे फिरना और अपनी सारी ऊर्जा इस खोज में खपा देना। इनमें कोई आज के जैसी वर्जनायें नहीं होती थीं— यानि एकल पति पत्नी सम्बंध जैसी। कोई किसी के साथ भी सो सकता था और बच्चों की कोई पैतृक पहचान निश्चित नहीं होती थी— वे समूह की साझा सम्पत्ति होते थे।

  उन्होंने अपनी पूरी यात्रा इन्हीं तीन बिंदुओं पर सीमित रह कर की और उस दौर की सभी प्रजातियों (बाद के होमो सेपियंस समेत) ने इसी नियम का पालन किया और उन्हें आज की तारिख में हम भोजन खोजी या भोजन संग्रह कर्ता के रूप में परिभाषित करते हैं। कोई भी उपजाऊ घाटी या क्षेत्र पांच सौ के लगभग आदिम मनुष्यों का पेट पाल सकती थी तो उसी हिसाब से उस क्षेत्र में समूह रहते थे और सदस्यों की संख्या बढ़ जाने पर वे अलग गुट में बंट जाते थे। यह सब लाखों साल यूँ ही चलता रहा और वैसी कोई तरक्की उन प्रजातियों ने नहीं की— जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं या जिसे हमने देखा है।

  फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि होमो सेपियंस ने पूरी दुनिया पर वर्चस्व स्थापित कर लिया— बाकी प्रजातियों को खत्म कर दिया और एक तरह से देखा जाये तो सिर्फ दस हजार सालों में इतनी तूफानी गति से तरक्की कर डाली कि पृथ्वी तो पृथ्वीइंसान अब अंतरिक्ष में विचरते दूसरे ग्रहों पर भी बसने के बारे में सोचने लगा है।

भाषा का विकास

  इस बात को समझने के लिये एक धारणा यह दी जाती है कि सत्तर हजार साल और तीस हजार साल पूर्व के पीरियड में सोचने और कम्युनिकेट करने के तरीकों के अविर्भाव को, जिसे हम संज्ञानात्मक क्रांति या काग्नीटिव रिवॉल्यूशन के नाम से जानते हैं— किसी चीज ने जन्म दिया जिसके बारे में हम पक्का कुछ नहीं जानते लेकिन एक मान्य सिद्धांत यह है कि किसी आकस्मिक जेनेटिक म्यूटेशंस ने सेपियंस के दिमाग की अंदरूनी वायरिंग को बदल दिया और उन्हें अलग ढंग से सोचने, समझने और भाषा का इस्तेमाल करते हुए कम्युनिनेट करने में सक्षम बना दिया। अब यह म्यूटेशन सेपियंस के बजाय नियेंडरथल्स के दिमाग में क्यों नहीं हुआ जो सेपियंस से साईज में बड़ा दिमाग रखते थे— इस बारे में वैज्ञानिकों के पास कोई क्लियर मत नहीं है।

 होमो इरेक्टस और होमो सेपियंस के बीच तीस हजार साल पहले हुई भाषा क्रांति और बारह हजार साल पहले हुई कृषि क्रांति ही वह प्रमुख अंतर थे जिन्होंने उनके मुकाबले हमें इतने कम वक्त में यहां ला खड़ा किया और इस फास्टेस्ट विकास यात्रा का सबसे भयानक पहलू यह भी है कि मात्र पांच सौ साल पहले हुई वैज्ञानिक क्रांति ने न सिर्फ हमारे विकास को असीमित गति दी है बल्कि बहुत तेजी से यही क्रांति हमें अपने या प्लेनेट के अंत की तरफ भी ले जा रही है।

Written by Ashfaq Ahmad